Monday, November 19, 2012

अब मैं ट्रेनों की कतारों मे नज़र आता हूँ,

Friends, this post is strikingly against the larger theme of this blog which is that of blissful ignorance. But then who does not welcome change? As a matter of fact the company I work for is just crazy about changes. We just got a 3rd major “strategic” org structure change communication in as many months. People who work here change their underwear less frequently!! But then I digress.

Coming back to this post, I wrote this on Diwali eve on my way back to home on a crowded London Tube. My fellow Indians here in London or for that matter any son or daughter working away from their families, trying to create a home away from home, may be able to relate to this. Hope you like it.
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अब मैं ट्रेनों की कतारों मे नज़र आता हूँ,
अपने वतन से बिचाड़ने की सज़ा पाता हूं

घर से निकलो तो चेहरे अनजान हें,
जगह बहुत हे, फिर भी लगता हे लोग मेरे होने से परेशान हैं,
देखो तो सबके पास सबकुछ है, पर जाने क्यूँ दिल बियाबान हैं,
इस परेशां भीड़ के बीच ..
इस परेशां भीड़ के बीच, कभी कभी, हाजी अली की दरगाह पे गाते उस फ़कीर की वो बेफ़िक्र मुस्कान भूळ नहीं पाटा हूँ,,
.. अपने वतन से बिचाड़ने की सज़ा पाता हूं ।।

दोस्त यूँ तो यहाँ भी उतने ही दिलदार हैं,
होली के रंग उतने ही लाल, और ईद पे उतना ही प्यार है,
मिल के मनाते हैं तो शायद उतनी ही ख़ुशी देता हर त्यौहार है,
पर जाने क्यूँ ..
पर जाने क्यूँ, दीवाली के जलते दीयों में, गली में पटाखे जलाते मोहल्ले के बच्चों की वो हंसी ढून्ढ नहीं पाटा हूँ,,
.. अपने वतन से बिचाड़ने की सज़ा पाता हूं ।।

ठंडी में यूँ तो रूम हीटिंग पूरा आराम देती है,
कमरे में रक्ही वो मशीन, कॉफ़ी भी पिला देती है,
पर जाने क्यूँ ..
पर जाने क्यूँ,  वो एक सर्द लहर जब कभी चेहरे को छूती है,
तो वो गली किनारे टापरी पे, मिट्टी के कुल्हर में गर्म अदरक चाय की वो चुस्की भूल नहीं पाटा हूँ,
.. अपने वतन से बिचाड़ने की सज़ा पाता हूं ।।

आराम के साधन यूँ तो यहाँ बोहत हैं,
नये देश में काम करने के फायदे भी अनगिनत हैं,
पर जाने क्यूँ ..
पर जाने क्यूँ, कभी कभी जब दिनभर की थकान मिटाने, अपने मेहेंगे बिस्तर पर जाता हूँ,
तो माँ की गोद की वो गर्माहट भूल नहीं पाटा हूँ,,
.. अपने वतन से बिचाड़ने की सज़ा पाता हूं ।।

अब मैं ट्रेनों की कतारों मे नज़र आता हूँ .. अब मैं ट्रेनों की कतारों मे नज़र आता हूँ ।।

6 comments:

R Athmanathan said...

Waah!!

Somebody has indeed matured!! Superb stuff!

Mein pahadiyon ki oonchayiyon mein nazar aata hoon,
apne watan se door rahne ka saza paata hoon!

Jiyo mere laal!!!

Pooran said...

Birju, bas kar ab rulayega bhee kya... i think you could not have expressed it better , very poetic but very real as well

"ab main apple pie, salad and aur cheese burgers khata hua nazar aata hoon,
apne des se bichadne kee saza pata hooon "

Champ said...

Brilliant birju!!! Bas inhi sazaoon ko bugatne ke dar se mein apne watan se bichadna nahi chaahta hoon!!!!

Umang said...

New to me to hear you like this...
Its like "Main Shayar to nahi, magar aae India, jabse chodo main tujhko, mujhko shayari aa gayi..."

But you should try more, you do a great job.

R. Ramesh said...

haha liked athmanathan comment:
Somebody has indeed matured!!

Rishav Sinha said...

Sirjee, shayarana mizaaj hain, par kya khub andaz hai...

nice...